Saturday, April 18, 2020

श्रीमद भगवद गीता का अध्याय ३ - ६ से १० श्लोक अर्थ के साथ - हिंदी में | Bhagvad Geeta Adhyay 3 Shlok 6 to 10 with meanings in Hindi



 श्रीमद भगवद गीता का अध्याय ३ - ६ से १० श्लोक अर्थ के साथ - हिंदी में | Bhagvad Geeta Adhyay 3 Shlok 6 to 10 with meanings in Hindi



श्रीमद भगवद गीता का अध्याय ३ - ६ से १० श्लोक अर्थ के साथ - हिंदी में

ॐ श्री परमात्मने नमः।

  •          कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
    इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारःस उच्यते।। ६ ।

अर्थ - कुछ मुढ लोग जो की सिर्फ दुनियावालों
को दिखाने के लिए की, हमने हमारी इन्द्रियों
पर नियंत्रण कर लिया है। हठपूर्वक इन्द्रियों
की सारी इच्छायें रोकते हैं और मन में
निरंतर (continues) उन्हीं इच्छाओं के बारें
में सोचते रहते है। इस तरह का बर्ताव करने
वाले लोगों को मिथ्याचारी अर्थात दंम्भी
(दिल में कुछ और बर्ताव कुछ और करतें हैं।)
कहा जाता है।

  • यस्त्विन्र्दियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्म योगमसक्तःस विशिष्यते ।। ७।।


अर्थ - हे अर्जुन, जो मनुष्य लोगों को दिखाने के
लिए
नहीं बल्कि अपने पूर्ण मनसे अपने इन्द्रियों
पर नियंत्रण करता है और अपने इच्छाओं
के प्रति आसक्त नहीं होता और अपने धर्म
के अनुसार कर्म करते रहता है और तो
और फल की इच्छा किए बिना किया जाने
वाला कर्म निष्काम कर्म सबसे श्रेष्ठ होता
है। ऐसा मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ होता है।




  • नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरिरयात्रापि च ते न प्रसिध्द्यदकर्मणः।। ८।।


अर्थ - तु सिर्फ अपना कर्म करते रह जो कर्म तेरे
धर्म के अनुसार हो। शास्त्रों के अनुसार
इस कर्म के लिए क्या बताया गया है। इस
के बारे में तु मत सोच। हे मनुष्य, (अर्जुन)
तुमे हर वक्त कर्म करते ही रहना चाहिए।
बिना कर्म किए तु तेरी जरूरतें पुरी भी
नहीं कर सकता जैसे कि, जिवित रहने
के लिए तुझे खाना खाना जरूरी है। खाने
के लिए कर्म याने की मेहनत जरुरी है।
इसी प्रकार तुम्हारी कोनसी भी जरुरतों
के लिए कर्म करना ही होगा।


  • यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग समाचार।। ९।।


अर्थ - अपने- अपने धर्म अनुसार अगर हम
कर्म करते हैं | तो हम जादा तर उसके फल
के बारे में नही सोचते | लेकन जब हम उसके
अलावा कुछ और जैसे की किसी की मददत
करते हैं | तो उसकी जरूरत पूरी करने से
हमे क्या मिलेगा ये सोचते ही रहते हैं | ये
सोचना ही हमे कर्म के बन्धन में डालता हैं|
किन्तु हे कौन्तेय, तु सिर्फ अपना कर्म करते
जा उसका फल तुझे अच्छा मिलेगा या बुरा
मिलेगा इस बारे मत सोच |

  • सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः |
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोSस्त्विष्टकामधुक् || १०||


अर्थ - सृष्टी की निर्मिती के वक्त ब्रम्हदेवने एक यज्ञ
किया और उसी यज्ञ से सृष्टीका आरंभ किया
और कहा की ; उसी यज्ञ से तुम प्रगती भी करो
और तुम्हारा वंश आगे बढे और ये यज्ञ तुम्हारा
इच्छित भोग प्रदान (देने वाला ) करनेवीला हो|
उसी प्रकार तुम भी यज्ञ करके अपनी इच्छायें
पूरी कर ले|

         गोपाल कृष्ण भगवान की जय। ।    

        । ।  गीता माता के जय । ।                    

  

Thursday, April 16, 2020

श्रीदत्ताची आरती व अष्टक(विसरू कसा मी गुरू पादुकाला )- Shri datta Aarti and Ashtak - Visaru kasa mi guru padukala


श्रीदत्ताची आरती व अष्टक(विसरू कसा मी गुरू पादुकाला ) Shri datta Aarti and Ashtak - Visaru kasa mi guru padukala

श्रीदत्ताची आरती, श्लोक और अष्टक   
(विसरू कसा मी गुरू पादुकाला )     

श्रीदत्ताची आरती


त्रिगुणात्मक त्रैमुर्ति दत्त हा जाणा।
त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा ।
नेती नेती शब्द न ये अनुमाना॥
सुरवर मुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना ॥ १ ॥

जय देव जय देव जय श्री गुरुद्त्ता ।
आरती ओवाळिता हरली भवचिंता ॥ धृ ॥

सबाह्य अभ्यंतरी तू एक द्त्त ।
अभाग्यासी कैची कळेल हि मात ॥
पराही परतली तेथे कैचा हेत ।
जन्ममरणाचाही पुरलासे अंत ॥ २ ॥

दत्त येऊनिया ऊभा ठाकला ।
भावे साष्टांगेसी प्रणिपात केला ॥
प्रसन्न होऊनि आशीर्वाद दिधला ।
जन्ममरणाचा फेरा चुकवीला ॥ ३ ॥

दत्त दत्त ऐसें लागले ध्यान ।
हरपले मन झाले उन्मन ॥
मी तू पणाची झाली बोलवण ।
एका जनार्दनी श्रीदत्तध्यान ॥ ४ ॥

       ।।   श्लोक ।। 

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु। गुरुर्देवो महेश्वराः।।
 गुरुः साक्षात्परब्रम्हः। तस्मै श्रीगुरु वे नमः।।

सदा सर्वदा योग तुझा घडावा।
तुझे कारणी देह माझा पडावा।। 
उपेक्षू नको गुणवंता अनंता।
प्रभू नायका मागणे हेचि आता।।

समर्थाच्या सेवका वक्र पाहे,
असा सर्व भूमंडळी कोण आहे।
ज्याची लिला वर्णित लोक तीन्ही
नुपेक्षी कदा रामदासाभिमानी।।

ज्या ज्या स्थळी हे मन जाय माझे,
त्या त्या स्थळी हे निजरुप तूझे।
मी ठेवितो मस्तक ज्या ठिकाणी,
तेथे तुझे सद्गुरु पाय दोन्ही।।

उपासनेला दृढ चालवावे
भुदेव संताशी सदा नमावे।
सत्कर्म योगे वय घालवावे
सर्वामुखी मंगल बोलवावे।।
            

              गुरुपादुका अष्टक
             
ज्या संगतीने विराग झाला।
मनोदरीचा जडभास गेला।।
साक्षातपरमात्मा मज भेटविला।
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। १।।

सद्योगपंथे घरि आणियेले।
आंगेचि माते परब्रम्ह केले।।
प्रचंड तो बोध रवी उदेला।
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। २।।

चराचरी व्यापकता जयाची। 
अखंड भेटी मजला तयाची।।
 परंपदी संगम पूर्ण झाला।
 विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ३।।

जो सर्वदा गुप्त जनांत वागे।
प्रसन्न भक्तां निजबोध सांगे।।
सद्भक्ति भावा करिता भुकेला।
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ४।।

अनंत माझे अपराध कोटी।
नाणी मनी घालुन सर्व पोटी।।
प्रबोध करितां श्रम फार झाला।
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ५।।

काही मला सेवनही न झाले।
तथापि तेणे मज उद्धरिले।
आतां तरी अर्पिन प्राण त्याला।
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ६।।

माझा अहंभाव असे शरीरीं। 
तथापि तो सद्गुरु अंगिकारी।। 
नाही मनीं अल्प विकार झाला। 
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ७।।

आता कसा हा मी उपकार फेडू। 
हा देह ओवाळून दूर सोडूं।। 
म्यां एकभावे प्रणिपात केला। 
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ८।।

जया वर्णितां वर्णितां वेद वाणी। 
म्हणे नेति नेति तिला जे दुरूनि।। 
नव्हे अंतना पार ज्याच्या रूपाला। 
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। ९।।

जो साधुचा अंकीत जीव झाला। 
त्याचा असे भार निरंजनाला।।
नारायणाचा भ्रम दूर केला।
विसरू कसा मी गुरुपादुकाला।। १०।।

         ||अवधुत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त||

Saturday, April 4, 2020

हनुमान चालीसा - हिंदी

          

        हनुमान जी का स्तोत्र-या हनुमान 

                      चालीसा                     


                      दोहा :


श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। 

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। 

              चौपाई :


 जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।


रामदूत अतुलित बल धामा।

अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।


महाबीर बिक्रम बजरंगी।


कुमति निवार सुमति के संगी।।



कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुंडल कुंचित केसा।।



हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

कांधे मूंज जनेऊ साजै।



संकर सुवन केसरीनंदन।

तेज प्रताप महा जग बन्दन।।



विद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर।।



प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया।।



सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा।।



भीम रूप धरि असुर संहारे।

रामचंद्र के काज संवारे।।



लाय सजीवन लखन जियाये।

श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।



रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।



सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।



सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा।।



जम कुबेर दिगपाल जहां ते।

कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।



तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राज पद दीन्हा।।



तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।

लंकेस्वर भए सब जग जाना।।



जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।



प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।



दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।



राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।



सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डर ना।।



आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हांक तें कांपै।।



भूत पिसाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै।।



नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा।।



संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।



सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा।



और मनोरथ जो कोई लावै।

सोइ अमित जीवन फल पावै।।



चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा।।



साधु-संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे।।



अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता।।



राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा।।



तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम-जनम के दुख बिसरावै।।



अन्तकाल रघुबर पुर जाई।

जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।



और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।



संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।



जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।



जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई।।



जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा।।



तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।। 



# दोहा :

 पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

    ।। श्रीराम भक्त हनुमान की जय।। 



मारुतीची आरती व स्तोत्र

                       मारुतीची आरती व स्तोत्र


        आरती


सत्राणें उड्डाणें हुंकार वदनी |
करि डळमळ भूमंडळ सिंधुजळ गगनीं |
कडाडिले ब्रम्हांड धाके त्रिभुवनी |
सुरवर नर निशाचर त्या झाल्या पळणी ||१||

जय देव जय देव जय श्रीहनुमंता
तुमचेनी प्रसादें न भी कृतांता ||धृ||

दुमदुमलें पाताळ उठिला प्रतिशब्द |
थरथरला धरणीधर मनिला खेद |
कडाडिले पर्वत उड़गण उच्छेद |
रामी रामदास शक्तीचा शोध ||2||

जय देव जय देव जय श्रीहनुमंता ||

      -श्री रामदास स्वामी


          स्तोत्र 


भीमरूपी महारुद्रा, वज्रहनुमान मारुती | 
वनारी अंजनीसूता रामदूता प्रभंजना ||१||

महाबळी प्राणदाता, सकळां उठवी बळें | 

सौख्यकारी दु:खहारी, दूत वैष्णव गायका ||२||

दीनानाथा हरीरूपा, सुंदरा जगदंतरा | 

पातालदेवताहंता, भव्यसिंदूरलेपना ||३||

लोकनाथा जगन्नाथा, प्राणनाथा पुरातना | 

पुण्यवंता पुण्यशीला, पावना परितोषका ||४||

ध्वजांगे उचली बाहो, आवेंशें लोटला पुढें |

 काळाग्नी काळरुद्राग्नी, देखतां कांपती भयें ||५||

ब्रह्मांडे माईली नेणों, आंवळे दंतपंगती | 

नेत्राग्नी चालिल्या ज्वाळा, भ्रुकुटी ताठिल्या बळें ||६||

पुच्छ ते मुरडिले माथां, किरीटी कुंडले बरीं | 

सुवर्ण कटी कांसोटी, घंटा किंकिणी नागरा ||७||

ठकारे पर्वता ऐसा, नेटका सडपातळू | 

चपळांग पाहतां मोठे, महाविद्युल्लतेपरी ||८||

कोटिच्या कोटि उड्डाणें, झेपावे उत्तरेकडे | 

मंद्राद्रीसाररिखा द्रोणू, क्रोधे उत्पाटिला बळें ||९||

आणिला मागुतीं नेला, आला गेला मनोगती | 

मनासी टाकिले मागे, गतीसी तुळणा नसे ||१०||

अणूपासोनि ब्रह्मांडाएवढा होत जातसे | 

तयासी तुळणा कोठे, मेरु मंदार धाकुटे ||११||

ब्रह्मांडाभोवते वेढे, वज्रपुच्छें करू शकें | 

तयासी तुळणा कैची, ब्रह्मांडी पाहता नसे ||१२||

आरक्त देखिलें डोळा, ग्रासिलें सूर्यमंडळा | 

वाढता वाढता वाढे, भेदिलें शून्यमंडळा ||१३||

धन धान्य, पशूवृद्धि, पुत्रपौत्र समस्तही | 

पावती रूपविद्यादी, स्तोत्रपाठें करूनियां ||१४||

भूतप्रेत समंधादी, रोगव्याधी समस्तहीं | 

नासती तूटती चिंता, आनंदे भीमदर्शनें ||१५||

हे धरा पंधरा श्र्लोकी, लाभली शोभली बरी |

दृढदेहो निसंदेहो, संख्या चन्द्रकळा गुणें ||१६||

रामदासी अग्रगण्यू, कपिकुळासि मंडणू | 

रामरूपी अंतरात्मा, दर्शने दोष नासती ||१७||

॥इति श्री रामदासकृतं संकटनिरसनं मारुतिस्तोत्रं                                  सम्पूर्णम्॥


   ।।  जय श्री राम।। 
      जय जय रघुवीर समर्थ