Tuesday, March 31, 2020

श्री रेणुका माता प्रार्थना स्तोत्र - मराठी


 । ।श्री रेणुका माता प्रार्थना स्तोत्र ।। 



अंबे एक करी, उदास न करी, भक्तास हाती धरी ।

विघ्ने दुर करी, स्वधर्म -उदरी, दारिद्र्य माझे हरी ।

चित्ती मुर्ती बरी, वराऽभय करी, ध्यातो तुला अंतरी ।

वाचा शुद्ध करी, विलंब न करी पावे त्वरे सुंदरी ॥ १ ॥

माते एकविरे, वराऽभयकरे, दे दु दयासागरे ।

माझा हेतु पुरे, मनात न उरे, संदेह माझा हरे ।

जेणे पाप सरे, कुबुद्धी विसरे, ब्रह्मैक्य-धी संचरे ।

देई पुर्ण करे भवाम्बुधी तरे ऐसे करावे त्वरे ॥ २ ॥

अनाथासी अंबे नको विसरु वो ।

भवस्सागरी सांग कैसा तरु वो ।

अन्यायी मी हे तुझे लेकरु वो ।

नको रेणुके दैन्य माझे करु वो ॥ ३ ॥

मुक्ताफलेः कुंकुमपाटलांगी ।

संदेह तारानिक रैविभाती ।

श्री मुलपिठांचलचुडिकाया ।

तामेकविरां शरणं प्रपद्ये ॥ ४ ॥

सखे दुःखिताला नको दुखवु वो ।

दिना बालकाला नको मुकलु वो ।

ब्रीदा रक्षी तु आपल्या श्री भवानी ।

हि प्रार्थना एकुनी कैवल्यदानी ॥ ५ ॥

॥ इति श्रीरेणुकामाता प्रार्थना संपूर्णा ॥

Sunday, March 29, 2020

श्रीकृष्ण के साथ कोरोना पर मात

              श्रीकृष्ण के साथ कोरोना पर मात

महाभारत के युद्ध में एक तरफ बहोत बडे-बडे योध्दा थे। 
जो की अधर्म के साथ थे और धर्म सिर्फ श्रीकृष्ण और पांडव थे। धर्म की जीत हो इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को
युद्ध में धोखा करना पड़ा। 

 युद्ध में अपने पिता द्रोणाचार्य के धोखे से मारे जाने पर अश्वत्थामा बहुत क्रोधित हो गये।

उन्होंने पांडव सेना पर एक बहुत ही भयानक अस्त्र "नारायण अस्त्र" छोड़ दिया।

इसका कोई भी प्रतिकार नहीं कर सकता था।यह जिन लोगों के हाथ में हथियार हो और लड़ने के लिए कोशिश करता दिखे उस पर अग्नि बरसाता था और तुरंत नष्ट कर देता था।

भगवान श्रीकृष्ण जी ने सेना को अपने अपने अस्त्र शस्त्र  छोड़ कर, चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े रहने का आदेश दिया। और कहा मन में युद्ध करने का विचार भी न लाएं, यह उन्हें भी पहचान कर नष्ट कर देता है।

नारायण अस्त्र धीरे धीरे  अपना समय समाप्त होने पर शांत हो गया।

इस तरह पांडव सेना की रक्षा हो गयी।

इस कथा प्रसंग का औचित्य समझें?

हर जगह लड़ाई सफल नहीं होती।प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए हमें भी कुछ समय के लिए सारे काम छोड़ कर, चुपचाप हाथ जोड़कर, मन में सुविचार रख कर एक जगह ठहर जाना चाहिए। तभी हम इसके कहर से बचे रह पाएंगे।

कोरोना भी अपनी समयावधि पूरी करके शांत हो जाएगा।
इसलिए हमें कोरोना से बचने के लिए घर में रह कर मनः
शांति के लिए भगवान का नामस्मरण करना चाहिए। या 
फिर जिसे हमे शांति मिले और दुनिया का भी कल्याण हो। 
ऐसा करना चाहिए। 

भगवान श्रीकृष्ण जी का बताया हुआ उपाय है, यह व्यर्थ नहीं जाएगा ।
🙏

Saturday, March 28, 2020

श्रीराम ची आरती-मराठीत


श्रीराम ची आरती-मराठीत


                भाग-१

        श्रीराम जय राम जय जय राम। 
        आरती ओवाळून पाहु सुंदर मेघश्याम।। धृ।। 
         दशरथनंदन कौसल्या सुत। 
         राज्य अभिषेक होतो बहु थाटात।। १।।
         कनकाचे ताट करी धनुष्यबाण। 
         मारुती हा पुढे उभा हात जोडुन।। २।।
         भरत शत्रुघ्न दोघे चामरें ढाळिती। 
        सिंहासनी आरुढले जानकी पती।। ३।।
        विष्णूदास नामा म्हणे मागणे हेची। 
       अखंडीत सेवा घडो राम चरणांची।। ४।।
         
         

                   भाग-२


      त्रिभुवनमंडितमाळ शोभतसे गळां ।
     आरती ओवाळूं पाहूं ब्रम्हपुतळा।। १।।
     श्रीराम जय राम जय जय राम।। 
     आरती ओवाळूं पाहुं सुंदर मेघश्याम।। धृ ।।
     ठकाराचें ठाण क्रीं धनुष्यबाण। 
     मारुती सन्मुख उभा कर जोडून।। २।।
    भरत शत्रुघ्न दोघे चामरें ढाळिती ।
    स्वर्गीहून देव पुष्पवृष्टी करिती।। ३।।
     रत्नखचित माणिक वर्णू काय मुकुटीं।
    आरती ओवाळूं चवदा भुवनांचे पोटीं।। ४।।
     विष्णूदास नामा म्हणे मागतों तूतें।।
     आरती ओवाळूं पाहू सीतापतीतें।। ५।।



रामायण और महाभारत पुनः प्रक्षेपण

रामायण और महाभारत पुनः प्रक्षेपण 

खुशखबर! खुशखबर!

आज से रामायणका पुनः प्रक्षेपण शुरू होने वाले हैं।
जो रोज सुबह 9 बजे भाग - १ और रात को 9 बजे भाग-२
इस प्रकार से दिखाया जाने वाला हैं। जो DD-National-
Tata Sky channel no. - 114 पर दिखाया जाएगा
आप  सभी इसका लाभ उठायें।

महाभारत भी आज से ही शुरू हो गया है। जो
सुबह-12 बजे और शाम- 7 बजे होने वाला हैं।
DD-Bharati पर दिखाया जाएगा।
Tata sky channel no. 1194 पर दिखाया
जाने वाला है। आप सब उसका लाभ उठायें। 

Friday, March 27, 2020

श्री महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र - संस्कृत

।। श्री महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र।। 


अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रिय वासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभ गञ्जिनि कैटभ भञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुंड गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे । दुमिदुमितामर धुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते । शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके । कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुर शिञ्जितमोहित भूतपते । नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते । शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते । निजगुणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु षिञ्चतितेगुण रङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुता पमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ।।
स्तुतिमितस्तिमितः सुसमाधिना।
नियमतऽ यमतोऽ नुदिनं पठेत्।
परमया रमयाऽपि निषेव्यते।
परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत्।। २२।।

रमयति किल कर्षंस्तेषु चित्त नराणाम्।
अवरजवर  यस्माद्रमकृष्णःकवीनाम्।।
अकृतसुकृतिगम्यं रम्यपद्यैंकहर्म्यं।
स्तवनमवनहेतुं प्रीतये विश्वमातुः।। २३।।

इन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो
 यतः  सोऽनवद्यः स्मृतः।
 श्रीपतेः सूनुना कारितो योऽधुना
 विश्वमातुः पदे पद्यपुष्पाज्जलिः।। २४।।

       ।।  इति श्री महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं संपूर्णम् ।।

Thursday, March 26, 2020

स्वामी चरित्र अवतणिका

   स्वामी चरित्र अवतणिका


  श्री गणेशाय नमः| श्री सरस्वत्यै नमः|
  श्री गुरूभ्यो नमः| श्री कुलदेवताय नमः|
  श्री अक्कलकोट निवासी-पूर्णदत्तावतार-
  दिगंबर यतिवर्य स्वामिराजाय नमः|
  ब्रह्मनंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ती।
  द्वंद्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
  एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधी साक्षिभूतं।
  भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूं तं नमामि।।

  प्रथमाध्यायी मंगलाचरण। कार्यसिध्द्यर्थ देवतास्तवन।
  आधार स्वामी चित्रास कोण। हेची कथन केले ए।। १।।

  श्रीगुरु कर्दळी वनातुनी आले। स्वामी रुपे प्रगटले।
  भूवरी प्रख्यात झाले। हे कथन द्वितीयाध्यायी।। २।।

   तारावया भक्तजनाला। अक्कलकोट प्रवेश केला।
   तेथीचा महिमा वर्णिला। । तृतीयाध्यायी निश्चये।। ३।।
 
   स्वामींचा करावया छळ। आले दोन संन्यासी खल।
   तेचि वृत्त सकल। चवथ्यामाजी वर्णिले।। ४।।
 
   मल्हारराव राजा बडोद्यासी। त्याने न्यावया स्वामींसी।
   पाठविले कारभार्यांसी। पाचव्यात ते कथा।। ५।।
 
   यशवंतराव सरदार । त्यासी दाविला चमत्कार।
   त्याचे वृत्त समग्र। सहाव्या वर्णिले।। ६।।
 
   विष्णुबुवा ब्रम्हचारी। त्यांची स्वामीचरणांवरी।
   भक्ती जडली कोणे प्रकारची। ते सातव्या सांगितले।। ७।।
 
   शंकर नामे एक गृहस्थ। होता ब्रम्हसमंधे ग्रस्त।
   त्यासी केले दुःखमुक्त। आठव्यात ते कथा।। ८।।
 
   खर्चोनिया द्रव्य बहुत। त्यांनी बांधला सुंदर मठ।
   ते वर्णन समस्त। नवव्या केले ए।। ९।।
 
   चिदंबर दिक्षितांचे वृत्त। वर्णिले दशमाध्यायात।
   ते ऐकता पुनीत। श्रोते होती सत्यची।। १०।।
 
   अकरावा आणि बारावा। तैसाची अध्याय तेरावा।
   बाळाप्पाचा इतिहास भरवा।त्यामाजी निरूपिला।। ११।।
 
   भक्तिमार्ग निरूपण। संकलित केले वर्णन।
   तो चवदावा अध्याय पूर्ण। सत्तारक भाविका।। १२।।
 
   बसाप्पा तेली सद्भक्त। तो कैसा झाला भाग्यवंत।
   त्याची कथा गोड बहुत। पंधराव्यात वर्णिली।। १३।।
 
   हरिभाऊ मराठे गृहस्थ। कैसे झाले स्वामी भक्त।
   सोळा सतरा यात निश्चित। वृत्त त्यांचे वर्णिले।। १४।।
 
   स्वामीसुताचा कनिष्ठ बंधु। त्यासी लागला भजनछंदु।
   जो दादाबुवा प्रसिद्धु। अठराव्या वृत्त त्यांचे।। १५।।
 
    वासुदेव फडक्यांचे गोष्ट। आणि तात्यांचे वृत्त।
    वर्णिले एकुणविसाव्यात। सारांशरूपे सत्य पै।। १६।।
 
    एक गृहस्थ निर्धन। त्यासी आले भाग्य पूर्ण।
    तेचि केले वर्णन। विसाव्या निर्धार।। १७।।
 
    स्वामी समाधिस्थ झाले। एकविसाव्यात वर्णिले।
    ग्रंथप्रयोजन कविवृत्त निवेदले।पूर्ण केले स्वामीचरित्र।।१८।।
 
    शके अठराशे एकुणवीस। वसंतऋतु चैत्र मास।
    गुरुवार वद्य त्रयोदशीस । पूर्ण केला ग्रंथ हा।। १९।।
 
    बळवंत नामे माझा पिता। पार्वती माता पतिव्रता।
    वंदोनी त्या उभयता। ग्रंथ समाप्त केला ए।। २०।।
 
    स्वामींनी दिधला हा वर। जो भावे वाचील हे चरित्र।
    त्यासी आयुरारोग्य अपार। संपत्ती संतती प्राप्त होय।।२१।।
 
    त्याची वाढो विमल कीर्ती। मुखी वसो सरस्वती।
    भवसागर तरोन अंती। मोक्षपद मिळो त्या।। २२।।

    ।। श्री स्वामी चरणार्पणमस्तु।।
                । शुभं भवतु।
 
 

  

Wednesday, March 25, 2020

श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्र - संस्कृत


श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्र 


 श्री परमात्मने नमः ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
अथ श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम
यस्य स्मरणमात्रेन जन्मसंसारबन्धनात्‌ ।
विमुच्यते नमस्तमै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
नमः समस्तभूतानां आदिभूताय भूभृते ।
अनेकरुपरुपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्टिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ।१।
युधिष्टिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्‌ ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्‌ ।२।
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्‌ ।३।
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्‌ ।
स्तुवन्नामसहस्त्रेण पुरुषः सततोत्थितः ।४।
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्‌ ।
ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ।५।
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्‌ ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्‌ ।६।
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्‌ ।
लोकनाथं महद्‌भूतं सर्वभूतभवोद्भभवम्‌ ।७।
एष मे सर्वधर्माणां धर्माऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ।८।
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्‌ब्रह्म परमं यः परायण्म्‌ ।९।
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्‌ ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ।१०।
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ।११।
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्त्रं मे श्रॄणु पापभयापहम्‌ ।१२।
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ॠषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ।१३।
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्‌कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ।१४।
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ।१५।
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ।१६।
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ।१७।
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।१८।
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।१९।
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्‌ ।२०।
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ।२१।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्‌ ।२२।
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।२३।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युत ।
वृषाकपरिमेयत्मा सर्वयोगविनिःसृतः ।२४।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।२५।
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ।२६।
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ।२७।
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माधक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।२८।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।२९।
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरुर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।३०।
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।३१।
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक ।३२।
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुध्दः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ।३३।
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।३४।
अमृत्युः सर्वदृक्‌ सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रृतात्मा सुरारिहा ।३५।
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्त्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ।३६।
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्त्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्‌ ।३७।
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ।३८।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ।३९।
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।४०।
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ।४१।
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरुपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ।४२।
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ।४३।
अमृतांशूद्भवो भानुः शशविन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ।४४।
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ।४५।
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्योऽव्यक्तरुपश्च सहस्त्रजिदनन्तजित्‌ ।४६।
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ।४७।
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।४८।
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ।४९।
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।५०।
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्‌ ।
महर्ध्दिर्‌ऋध्दो वृध्दात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ।५१।
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः ।५२।
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ।५३।
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनोगुहः ।५४।
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्ध्दिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।५५।
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ।५६।
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।५७।
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ।५८।
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्‌ ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।५९।
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयुपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।६०।
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्‌ ।६१।
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्‌ ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।६२।
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्‌ ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ।६३।
धर्मगुब्धर्मकृध्दर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्‌ ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ।६४।
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्‌गुरुः ।६५।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ।६६।
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।६७।
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तामा महोदधिशयोऽन्तकः ।६८।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।६९।
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्‌ ।७०।
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ।७१।
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।७२।
भगवान्‌ भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ।७३।
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ।७४।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्‌ ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्‌ ।७५।
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।७६।
अनिवर्ती निवृत्तामा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।७७।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ।७८।
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।७९।
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।८०।
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुध्दात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।८१।
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।८२।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ।८३।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्‌‍ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद्‌ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।८४।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।८५।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।८६।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।८७।
सद्‌गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।८८।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ।८९।
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्‌ ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।९०।
एको नैकः सवः कः किं यत्पदमनुत्तमम्‌ ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।९१।
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ।९२।
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्‌ ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।९३।
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृङ्गो गदाग्रजः ।९४।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्‌ ।९५।
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।९६।
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।९७।
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ।९८।
सुवर्णविन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्र्दो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ।९९।
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।१००।
सुलभः सुव्रतः सिध्दः शत्रुजिच्छ्त्रुतापनः ।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ।१०१।
सहस्त्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ।१०२।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलोगुणभृन्निर्गुणो महान्‌ ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्द्धनः ।१०३।
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।१०४।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः ।१०५।
सत्ववान्सात्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ।१०६।
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।१०७।
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकदोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ।१०८।
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ।१०९।
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।११०।
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।१११।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दु:स्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ।११२।
अनन्तरुपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्त्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।११३।
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ।११४।
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।११५।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्वं तत्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ।११६।
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञॊ यज्ञोपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ।११७।
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।११८।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।११९।
शङ्खभृन्नदकी चक्री शार्ङ्ग्धन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।१२०।
॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥

Tuesday, March 24, 2020

श्री राम रक्षा स्तोत्र .

                     

                     

                     ||श्री राम रक्षा स्तोत्र ||

विनियोग: 
श्रीगणेशाय नमः|
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता। अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान कीलकम। श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः।
अथ ध्यानम्‌:
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामांकारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालंकार दीप्तं दधतमुरुजटामंडलं रामचंद्रम।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥1॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमंडितम्‌ ॥2॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरांतकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥3॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्‌ ॥8॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥9॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्‌ ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥10॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न दृष्टुमति शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाऽभिरक्षितम्‌ ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥14॥


आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥


आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥16॥


तरुणौ रूप सम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥


फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥


शरण्यौ सर्र्र्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥


आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥20॥


सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥


रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥


वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयाऽन्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥


रामं दूवार्दलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥25॥


रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ ।


राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥26॥


रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥


श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।


श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥


श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचंसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥


माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयलुर्नान्यं
जाने नैव जाने न जाने ॥30॥


दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनन्दनम्‌ ॥31॥


लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥



मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥


कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥34॥


आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥35॥


भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम्‌ ॥36॥


रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रामेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥37॥


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥
|| इति श्रीबुधकौशिकविरचितं रामरक्षास्तोत्रसंपूर्णम्‌ 

॥श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु  ||

श्रीमद्भागवत गीता १ला अध्याय-संस्कृत

     श्रीमद्भागवत गीता १ला अध्याय-संस्कृत 

             धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥१॥

            संजय उवाच

दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥२॥

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणा-माचार्य महतीं चमूम्‌।

व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३॥

अत्र शूरा महेष्वासाभीमार्जुनसमा युधि।

युयुधानो विराटश्चद्रुपदश्च महारथः॥४॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।

पुरुजित्कुन्तिभोजश्चशैब्यश्च नरपुङवः॥५॥

युधामन्युश्च विक्रान्तउत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।

नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥७॥

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥८॥

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥१०॥

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥११॥ 

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।

सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌॥१२॥

ततः शंखाश्च भेर्यश्चपणवानकगोमुखाः।

सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥१३॥

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्तेमहति स्यन्दने स्थितौ।

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥१४॥

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥१५॥

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥१६॥

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।

धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥१७॥

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते|

सौभद्रश्च महाबाहुःशंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥१८॥

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌।

नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥१९॥

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः।

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥२०॥

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।

               अर्जुन उवाच

सेनयोरुभयोर्मध्येरथं स्थापय मेऽच्युत॥२१॥

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌।

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥२२॥

योत्स्यमानानवेक्षेऽ य एतेऽत्र समागताः।

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥२३॥

             संजय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥२४॥

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌।

उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥२५॥

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌।

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥२६||

श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।

तान्समीक्ष्यसकौन्तेयःसर्वान्‌बन्धूनवस्थितान्‌॥२७॥

कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌।

           अर्जुन उवाच

दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥२८॥

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९॥

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३०॥

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥३१॥

न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।

किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२॥

येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च|३३||

आचार्याः पितरः पुत्रास्- तथैव च पितामहाः।

मातुलाः श्वशुराःपौत्राःश्यालाःसंबंधिनस्तथा॥३४॥

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।

अपि   त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५॥

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।

पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥३६॥

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७॥

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥३८॥

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९॥

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम-धर्मोऽभिभवत्युत॥४०॥

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१॥

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।

पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२॥

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३॥

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥४४॥

अहो बत महत्पाप कर्तुं व्यवसिता वयम्‌।

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४५॥

यदि मामप्रतीकारम- शस्त्रं शस्त्रपाणयः।

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्-तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥४६॥

                 संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌।

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७॥
       ॐ  तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु 
    ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
    अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोSध्यायः||१||

Saturday, March 7, 2020

श्रीमद्भागवत गीता का १२वा अध्याय - संस्कृत में

                            ॐश्रीपरमात्मने नमः 
                             अथ द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच -

एवं सततयुक्ता ये भक्ता-स्त्वां पर्युपासते ।

ये चाप्यक्षरमव्यक्तंतेषां के योगवित्तमाः ॥१२- १॥

श्रीभगवानुवाच -
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥१२- २॥

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम- व्यक्तं पर्युपासते ।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥१२- ३॥

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥१२- ४॥

क्लेशोऽधिकतरस्तेषा-मव्यक्तासक्तचेतसाम् ।

अव्यक्ता हि गति- र्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥१२- ५॥

ये तु सर्वाणि कर्मणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥१२- ६॥

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥१२- ७॥

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥१२- ८॥

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥१२- ९॥

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।

मदर्थमपि कर्मणि  कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१२- १०॥

अथैतदप्यशक्तोऽसि  कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥१२- ११॥

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्- ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्- त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२- १२॥

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।

निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥१२- १३॥

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो  मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२- १४॥

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥१२- १५॥

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२- १६॥

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१२- १७॥

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥१२- १८॥

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।

अनिकेतः स्थिरमति- र्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१२- १९॥

ये तु धर्म्यामृतमिदं  यथोक्तं पर्युपासते ।

श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥१२- २०॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे

भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥