श्रीमद्भागवत गीता का ३ रा अध्याय
१से५श्लोक हिंदी अनुवाद के साथ
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
।। अथ तृतीयोऽध्यायः ।।
अर्जुन उवाच
१. ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुध्दिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। १।।
अर्थ - अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! यदि आपको कर्म
से जादा ज्ञान श्रेष्ठ लगता है। तो केशव, आप मुझे ये इतना बड़ा कर्म (युध्द करने के लिए)क्यों
कह रहे हो?
२.व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुध्दिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।। २।।
अर्थ - आप ये बात बोलके मेरे बुद्धि को मोहित कर रहे हो। मुझे ये बताइये की ज्ञान श्रेष्ठ या कर्म श्रेष्ठ है। जो करके मै कल्याण को प्राप्त हो जाऊ।
श्रीभगवानुवाच
३.लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रयोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।। ३।।
अर्थ- श्रीभगवान ने कहा-हे निष्पाप अर्जुन! इस लोक में
दो प्रकार की निष्ठा है। जैसे कि - कुछ लोग मानते हैं
कि ज्ञान की प्राप्ति से भगवान को प्राप्त कर सकते
है। इस प्रकार लोगों को सांख्ययोगी कहतें है। तो
कुछ लोग मानते कि अगर प्रत्येक जण अपने-
अपने धर्म के अनुसार कर्म करे जैसे कि- स्त्री
का स्त्री धर्म, पत्नीधर्म, मातृधर्म, पितृधर्म,
भातृधर्म,आचार्यधर्म, विद्यार्थीधर्म हर एक व्यक्ति
का धर्म अलग है। तो हर वक्त अपने धर्म के
अनुसार कार्य करके भगवान को प्राप्त कर सकता है।
उन्हें कर्मयोगी कहते हैं।
४. न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नते।
न च सन्न्यसनादेव सिध्दिं समधिगच्छति।। ४।।
अर्थ- कोई भी व्यक्ति कर्म करे बिना निष्कर्मता ( कर्म के
फल इच्छा किये बिना किया जाने वाला कर्म) कर्म
करने से भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। कर्म का
त्याग करना से कोई भी व्यक्ति सिध्दिं या भगवान
को प्राप्त नहीं कर सकता।
५. न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्ये ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।। ५।।
अर्थ- कोई भी व्यक्ति थोड़ी देर के लिए भी बिना कर्म
नहीं रह सकता., क्योंकि हम सब प्रकृति से बंधे हुए
हैं। हमें हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्म
करना ही पड़ता है। इसलिए हमें अपने कर्म करने
चाहिए उनसे भागना नहीं चाहीये।

No comments:
Post a Comment